कानों की बालियाँ

आज चाय का कप हाथ में ले कर
खिड़की से बाहर देखा तो बर्फ़ीला शहर था
आस पास कोई नहीं, इक्का दुक्का गाड़ी आती जाती दिखी
सोचा हरियाली नहीं है फिर भी कितना उपजाऊ सन्नाटा है !
यादों के बीज एक के बाद एक अंकुरित हो रहे थे..

फिर अचानक छह साल की चारु दिखी
खिलखिलाती हुई सड़क के बीचों बीच मस्ती में भाग रही थी
आइस पाईस खेलती हुई अमलतास के पेड़ के पीछे छुप गयी,
पीले फूलों के गुच्छों को ढाल बना लिया
” टाईम्स प्लीज़ ! हम 12 नम्बर में पानी पीने जा रहें है , आना है तो आ जा”
किसी ने आवाज़ लगायी
विक्टोरीया पार्क के सब बच्चों की टोली निकल पड़ी
अल्हड़, निश्छल, उछलती कूदती नहर के समान

12 नम्बर घर वाली दादी को प्यार से सभी अम्माँ बुलाते थे
अम्माँ देख के बोली ” क्यूँ छुटकी, कान पके तो नहीं तेरे?”
“ना अम्माँ अब ठीक है, बस टीस लगती है कभी कभी”
“सरसों के तेल में हल्दी मिला के लगाती रहना”
“ठीक है अम्माँ , मम्मी को बता दूँगी”
छोटी चारु पानी गटकते हुए बोली

तीन दिन पहले अम्माँ ने कान छेदे थे चारु के
मोमबत्ती की लौ में सुई को गरम किया
धागे को हल्दी का लेप लगाया
और एक ही वार में तीर निशाने के आर पार !
बहुत रोई थी मैं उस दिन , इच्छा पूरी होने का मन ही मन विलाप भी किया
“जब बालियाँ पहनेगी तो कितनी प्यारी दिखेगी, रोती क्यूँ है ?”
अम्माँ ने सीधे सरल शब्दों में बहलाया था

आज उँगलियाँ सहसा ही कान की बालियों को सहलाने लगी
मेरठ के बचपन में जो पड़ोस के रिश्ते पनपे
उन्होंने सभी रिश्तों की जड़ें पकड़ के रखना सिखाया ।
दर्द भी होगा, कुछ दिन टीस भी उठेगी
सहनशीलता का लेप लगेगा तो
एक दिन सोने की बालियों जैसे चमकेंगे ये रिश्ते !

वाक़ई, न्यू यॉर्क के इस बर्फ़ीले सन्नाटे में यादों की इतनी चहल पहल है
मेरी खिड़की के बाहर बहुत रौनक़ है आज!

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